मेरी दुनिया
आंखो ने देख कैसी साजिश की है।
हर ज़र्रे में तेरी तस्वीर की गुज़ारिश की है।।
अक्सर दिलों के झरोखे में आराम फरमाते हैं लोग ।
फिर वो झरोखे छोड़ उड़ जाते है लोग।।
हम समझते हैं जिन्हें घर के बाशिंदे कि तरह।
अक्सर वहीं घरों को छोड़ जाते है।।
सोचता हूं खुदा से में क्या मांगू
सस्ते दामों में यहां खुदा बिकते हैं।
दुनिया के बाज़ार में हर खरीदार बिकते हैं।।
आइना मुझसे मेरे पहले की सूरत मांगे
अपने मेरे मुझसे मेरे होने की पहचान मांगे।
कैसे बोलू वो में हूं नहीं जो तुझे सामने से दिखता हूं।।
ना छोड़ हाथ खुले बाज़ार में मुझ मासूम का।
यह दुनिया मुझे दर्द ए नासूर सा लगता है ।।
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